आईसीएआर-आरसीईआर निदेशक ने केले और तरबूज की उन्नत खेती का किया निरीक्षण

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-अमसारी गांव में की गई कृषि गतिविधियों की समीक्षा      -गेहूं, चना, मसूर और मक्का की प्रक्षेत्र ट्रायल पर चर्चा। बक्सर खबर। आईसीएआर-आरसीईआर पटना के निदेशक डॉ. अनूप दास ने डुमरांव अनुमंडल के अमसारी गांव स्थित कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा किए जा रहे कार्यों की गहन समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने प्रदर्शन इकाइयों, चल रही परियोजनाओं और विभिन्न कृषि क्रियाकलापों का निरीक्षण किया। डॉ. दास ने विशेष रूप से गेहूं की विभिन्न तिथियों में की गई सिंचाई और उसके प्रभाव पर प्रक्षेत्र परीक्षण का निरीक्षण किया। उन्होंने जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के अंतर्गत रबी सीजन में लगाई गई फसलों जैसे गेहूं, चना, मसूर और मक्का की उत्पादकता एवं प्रभाव का विश्लेषण किया।

उन्होंने सुझाव दिया कि गेहूं की बुआई 20 नवंबर तक तथा चना, मसूर और सरसों की बुआई 10-15 नवंबर तक करने से अधिक उपज प्राप्त हो सकती है और कीट एवं मौसमी प्रभावों को भी कम किया जा सकता है। क्लस्टर अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन के अंतर्गत सरसों की उन्नत किस्म आरएच 9725 की 300 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती की सराहना करते हुए उन्होंने इसे किसानों में व्यापक रूप से प्रचारित करने पर जोर दिया। बताया गया कि यह किस्म समय पर बोने पर प्रति हेक्टेयर 20 क्विंटल तक उपज दे सकती है। डॉ. दास ने प्राकृतिक खेती पर चल रहे अनुसंधान ट्रायल का निरीक्षण कर इसे और अधिक बेहतर बनाने के लिए आवश्यक सुझाव भी दिए। अपने दो दिवसीय दौरे में डॉ. दास ने ग्राम अमसारी के कृषक संजय राय एवं रमापति राय के खेतों में ड्रिप सिंचाई से केले की जी-9 किस्म एवं दो हेक्टेयर क्षेत्र में तरबूज की खेती का निरीक्षण किया और किसानों से संवाद कर उपयोगी सुझाव दिए।

मक्का की खेती देखते निदेशक डॉ अनूप दास व अन्य कृषि वैज्ञानिक।

स्थानीय लालगंज स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित बैठक में डॉ देवकरन ने प्रशिक्षण कार्यक्रम, ऑन फार्म ट्रायल, फसल प्रदर्शन और विस्तार गतिविधियों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। डॉ दास ने संपादित कार्यों की सराहना करते हुए “एक जिला, एक उत्पाद” योजना के तहत सोनाचूर चावल को बढ़ावा देने और एफपीओ के माध्यम से उत्पादन एवं मार्केटिंग को प्रोत्साहित करने की बात कही। उन्होंने उन्नत नस्ल के पशुपालन इकाइयों की स्थापना का सुझाव दिया, साथ ही धान-गेहूं के साथ दलहनी फसलों को अपनाने और गरमा सीजन में मूंग व उड़द  की खेती को प्रोत्साहित करने पर बल दिया। निचली भूमि वाले क्षेत्रों के लिए कृषि विज्ञान केंद्र में धान-मछली-मखाना प्रणाली की प्रदर्शन इकाई स्थापित करने की सिफारिश की गई।

 

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